Monday, April 12, 2010

-"बानवे बंसत'

अम्माजी की नई पुस्तक आई है -"बानवे बंसत'
उसी के कुछ अंश दे रही हूँ
उदासी से घिरी अम्माजी कहती हैं-

जी रही हूँ मैं भला, कौन-सी आशा लिए।
बेबसी मुझको मिली है बेबसी के नाम पर।


एकबार मौसी की मार भी खानी पड़ी खेलते २ देर जो हो गई थी, तब पंक्तियाँ कुछ मन से इस तरह निकली-

ज़िन्दगी मिलना तो कुछ मुश्किल नहीं है दोस्तों,
मुझको तो रोना पड़ा है, ज़िन्दगी के नाम पर।

भक्ति भाव से ओत-प्रोत अम्माजी की कलम कभी यूँ बोल उठती-

बख़्शी है क्या क्या नेमतें, इन्सान को प्रभु।
कुछ तो मुझको भी दिया है, आपने ईनाम में।

बाकी अगली पोस्ट में आशा है पंसद आए
Bhawna

19 comments:

  1. bahut khoob amma ji ke achche swasthya ki kaamna karta hun...wo hamesha yunhi apni kalam se hame ashish de...
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. सुंदर पोस्ट

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  3. सुन्दर प्रस्तुति। आभार।

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  4. ज़िन्दगी मिलना तो कुछ मुश्किल नहीं है दोस्तों,
    मुझको तो रोना पड़ा है, ज़िन्दगी के नाम पर।
    शानदार शेर
    अम्मा जी की पुस्तक की कुछ आैर रचनाआें से परिचित कराइए नां

    अशोक मधुप

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  5. बानवे बंसत-पढ़ने की इच्छा जाग उठी. अगली पोस्ट का इन्तजार करते हैं.

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  6. pasand hi nahi bahut pasand aayi. main kafi dino ke aapki post ka intzaar kar rahi thi

    _Shruti

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  7. ज़िन्दगी मिलना तो कुछ मुश्किल नहीं है दोस्तों,
    मुझको तो रोना पड़ा है, ज़िन्दगी के नाम पर ...

    हमारे आपने पुस्तक पढ़ने की इच्छा जगा दी है ... बहुत ही कमाल का शेर है ये ...

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  8. ज़िन्दगी मिलना तो कुछ मुश्किल नहीं है दोस्तों,
    मुझको तो रोना पड़ा है, ज़िन्दगी के नाम पर।

    वाह...अम्माजी को नमन...
    ये पुस्तक कहाँ से मिल सकती है पढने को?
    नीरज

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  9. ammajee khoob achcha likhin hain.bhawnajee aapko bhi badhayee.

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  10. अतिउत्तम । आगे प्रतीक्षा रहेगी ।

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  11. सुन्दर प्रस्तुति

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  12. अम्मा जी को प्रणाम ।
    नयी पोस्ट डालें ।

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  13. अम्मा जी को प्रणाम ।
    नयी पोस्ट डालें ।

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  14. Amma ji ko mera bhi pranaam..Mujhe bhi agli post ka intjaar hai

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  15. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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