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मैं उसे जानूं न जानूं, जानता है वो मुझे
और अपना सिर्फ़ अपना मानता है मुझे।
हादसों के बोझ से उसकी कमर टूटी मगर
अपनी बद-हाली का कारण मानता है वो मुझे।
ज़र्फ का मेरे जनाज़ा उठ गया बरसों हुए
आज भी बाज़र्फ़ लेकिन मानता है मुझे।
इश़्क की फ़ितरत यही है जान ले लेता है वो
मैंने उसपे जां लुटा दी मानता है वो मुझे।
मैं तो खुद वाक़िफ़ नहीं थी आज तक इस बात से
जान से बढ़के प्यारी मानता है वो मुझे।
बदहाली-फटेहाली, फ़ितरत-शदत, ज़र्फ़-सहनशीलता, वाकिफ़-परिचित, बाज़र्फ़-सहनशील
और अपना सिर्फ़ अपना मानता है मुझे।
हादसों के बोझ से उसकी कमर टूटी मगर
अपनी बद-हाली का कारण मानता है वो मुझे।
ज़र्फ का मेरे जनाज़ा उठ गया बरसों हुए
आज भी बाज़र्फ़ लेकिन मानता है मुझे।
इश़्क की फ़ितरत यही है जान ले लेता है वो
मैंने उसपे जां लुटा दी मानता है वो मुझे।
मैं तो खुद वाक़िफ़ नहीं थी आज तक इस बात से
जान से बढ़के प्यारी मानता है वो मुझे।
बदहाली-फटेहाली, फ़ितरत-शदत, ज़र्फ़-सहनशीलता, वाकिफ़-परिचित, बाज़र्फ़-सहनशील
लेखिका- लीलावती बंसल
प्रस्तुतकर्त्ता- भावना
प्रस्तुतकर्त्ता- भावना
ज़र्फ का मेरे जनाज़ा उठ गया बरसों हुए
ReplyDeleteआज भी बाज़र्फ़ लेकिन मानता है मुझे।
बहुत सुंदर रचना.
रामराम.
खूबसूरत लगे एक एक शेर ।
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा ... सुंदर रचना ... बधाई।
ReplyDeleteसमर्पण के गहर भाव...!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर लगा हर शेर ..उम्दा रचना शुक्रिया
ReplyDeleteखूबसूरत गजल।
ReplyDelete----------
तस्लीम
साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन
क्या तारीफ करूँ ...शब्दों की कमी है
ReplyDeleteकुछ उर्दू के शब्दों का अर्थ भी पता चला । सुन्दर रचना । धन्यवाद ।
ReplyDeleteवाह ! वाह ! वाह !
ReplyDeleteबहुत बहुत सुन्दर !! हरेक शेर जानदार शानदार...सीधे दिल में उतरती हुई...
हादसों के बोझ से उसकी कमर टूटी मगर
ReplyDeleteअपनी बद-हाली का कारण मानता है वो मुझे।
खूबसूरत शेर है...........
वैसे पूरी ग़ज़ल लाजवाब है
... बेहद प्रभावशाली।
ReplyDeleteइश़्क की फ़ितरत यही है जान ले लेता है वो
ReplyDeleteमैंने उसपे जां लुटा दी मानता है वो मुझे।
वाह.....वाह....!! बहुत खूब....!!
मैं तो खुद वाक़िफ़ नहीं थी आज तक इस बात से
जान से बढ़के प्यारी मानता है वो मुझे।
भावना जी कमाल का लिखतीं हैं आप की अम्मां जी ....बहुत सुन्दर....!!
mera yahan aana ittefaq tha par comment dena ittefaq nahi hai.
ReplyDeleteBahut hi achchha laga rachnayein padh kar.
Navnit Nirav
पुर-असर अश`आर जब भी बांच लेता है मेरे ,
ReplyDeleteतब ग़ज़ल की शाहज़ादी मानता है वो मुझे .
खूबसूरत ग़ज़ल के इन उम्दा ख्यालात के
लिए मेरा abhivaadan स्वीकार करें ....
---मुफलिस---
bhawana ji bahut sundar rachana hai
ReplyDeletebahut sundar
ReplyDeletebhawana ji acchi post hai....
ReplyDeletesaath hi ise prachi ke paar main bhi dekha....
apne isko save kiya iske liye dhanyvaad....
..samay aane par prakshit kar diya jiyega .
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteसाह जी मैं आपका आशय नहीं समझी कहाँ प्रकाशित कर दिया जायेगा? मैंने तो कहीं प्रकाशित करने की बात नहीं की क्या आप मुझे लिंक भेज सकते हैं जहाँ ये पहले भी पढ़ी है आपने क्योंकि ये मैंने टाइप करके सिर्फ मेरे द्वारा बनाए अम्माजी के ब्लॉग पर ही डाली है...
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