7.
मर गई इन्सानियत इन्सान की इस दौर में
शान मिट्टी हो गई ईमान की इस दौर में।
शान मिट्टी हो गई ईमान की इस दौर में।
अब किसी के खून में सुर्ख़ी नहीं, गर्मी नहीं
चर्ख़ तक गुड्डी चढ़ी शैतान की इस दौर में।
काम कुछ आती नहीं अब बुज़र्गों की दुआ
क्या ज़रूरत रह गई भगवान की इस दौर में।
जिस जगह भी देखिए हैवानियत का नाच है
हर कहीं सत्ता है बस हैवान की इस दौर में।
आज की दुनिया है बस चालाकियों पर है टिकी
ख़्वार है मिट्टी बहुत, नादान की इस दौर में।
लेखिका- लीलावती बंसल
प्रस्तुतकर्त्ता- भावना कुँअर
प्रस्तुतकर्त्ता- भावना कुँअर
बहुत उम्दा प्रस्तुति. आभार इसे यहाँ पेश करने का.
ReplyDeleteसशक्त अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteसच बात लिखी है आपने । सुन्दर रचना । अच्छे भाव ।धन्यवाद
ReplyDeleteबेबाकी से सच लिखा है आपने
ReplyDeleteBahut sundar rachna.....
ReplyDeleteजिस जगह भी देखिए हैवानियत का नाच है
ReplyDeleteहर कहीं सत्ता है बस हैवान की इस दौर में।
waah bahut achhi lagi gazal
काम कुछ आती नहीं अब बुज़र्गों की दुआ
ReplyDeleteक्या ज़रूरत रह गई भगवान की इस दौर में।
नमन है इस लेखनी को...अद्भुत...
नीरज
सच लिखा आपने ...
ReplyDeleteबहुत सुंदर !
ReplyDeleteघुघूती बासूती
काम कुछ आती नहीं अब बुज़र्गों की दुआ
ReplyDeleteक्या ज़रूरत रह गई भगवान की इस दौर में।
aaj ke samaj ka yatharth chitran milta hai is gazal mein, dil se nikli huye baat lagti है
आज के दौर की सटीक तस्वीर।
ReplyDeleteबेहद उम्दा......पूर्णत: सच्चाई को दर्शाती रचना.....
ReplyDeleteसुन्दर कृति है
ReplyDelete---
चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें
जिस जगह भी देखिए हैवानियत का नाच है
ReplyDeleteहर कहीं सत्ता है बस हैवान की इस दौर में।"
बहुत प्रासंगिक और सच्ची पंक्तियां. धन्यवाद.
ख़्वार है मिट्टी बहुत, नादान की इस दौर में
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